एक समय था, जब लोग समूह और परिवार में रहना पसंद करते थे। जिसका जितना बड़ा परिवार होता वो उतना ही संपन्न और सौभाग्यशाली माना जाता था और जिस परिवार में मेल-मिलाप होता था और संपन्नता होती थी उसकी पूरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा रहती थी। यह ऐसा समय था, जब समाज में परिवारों का बोलबाला था और समाज में संपन्नता की निशानी परिवार की प्रतिष्ठा से लगाई जाती थी। उस दौर में व्यक्ति की प्रधानता नहीं थी, बल्कि परिवारों की प्रधानता थी। परिवार के धनी लोगों की बिरादरी में विशेष इज्जत होती थी और ऐसे लोग पूरे समूह और समाज का प्रतिनिधित्व करते थे। बड़े परिवार का मुखिया पूरे समाज का मुखिया बनकर सामने आता था और उसकी बात का एक विशेष वजन होता था।

संयुक्त परिवारों के उस दौर में परिवार के सदस्यों में प्रेम, स्नेह, भाईचारा और अपनत्व का एक विशिष्ट माहौल रहता था। इस माहौल और संयुक्त परिवारों का फायदा परिवार के साथ पूरे समाज को मिलता था और जो पूरे समाज और राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने का संदेश देता था। उस दौर में संयम, बड़ों की कद्र, छोटे बड़े का कायदा, नियंत्रण इन सब बातों का प्रभाव था। ऐसे ही संयुक्त परिवारों से संयुक्त समाज का निर्माण हुआ था और पूरा मोहल्ला और गांव एक परिवार की ही तरह रहते थे।

परिवार का नहीं, मोहल्ले का बुजुर्ग सबका बुजुर्ग माना जाता था और ऐसे बुजुर्गों के सामने जुबानचलाने या किसी अप्रिय कृत्य करने का साहस किसी का नहीं होता था। उस दौर में मोहल्लों में ऐसा माहौल और अपनापन होता था कि गांव का दामाद या मोहल्ले का दामाद कहकर लोग अपने क्षेत्र के दामाद को पुकारते थे और अगर कोई भानजा है तो किसी परिवार का नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और गांव का भानजा माना जाता था और यही कारण था कि लोग गांव की बेटी या गांव की बहू कहकर ही किसी औरत को संबोधित करते थे।

सच! कितना अपनापन और आत्मिक स्नेह था उस दौर में! यह वह समय था, जब किसी व्यक्ति की चिंता उसकी चिंता न बनकर पूरे परिवार की चिंता बन जाती थी और सहयोग से सब मिलकर उस चिंता को दूर करने का प्रयास करते थे। ऐसे समय में रिश्तों में अपनापन था और लोग रिश्ते निभाते थे ढोते नहीं थे।
उस समय में समाज में रिश्तों को बोझ नहीं समझा जाता था बल्कि रिश्तों की जरूरत समझी जाती थी और ऐसा माना जाता था कि रिश्तों के बिना जीवन जीया ही नहीं जा सकता है। लेकिन बदलते दौर और समय ने इस सारी व्यवस्था को बदलकर रख दिया है। अब वह दौर नहीं रहा।

आज परिवार छोटे हो गए हैं और सब लोग स्व में केंद्रित होकर जी रहे हैं। पहले व्यक्ति पूरे परिवार के लिए जीता, था पर आज व्यक्ति अपने बीवी-बच्चों के लिए जीता है। उसे अपने बच्चों और अपनी बीवी के अलावा किसी और का सुख और दुख नजर नहीं आता है। वह अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ इसी उधेड़बुन में लगा देता है कि कैसे अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं दे और कैसे अपने आपको समाज में प्रतिष्ठित बनाए।

आपाधापी के इस दौर में जीवन से संघर्ष करता हुआ व्यक्ति आज रिश्तों को भूल गया है। आज के बच्चों को अपने चाचा, मामा, मौसी, ताया के लड़के-लड़की अपने भाई-बहन नहीं लगते। उन्हें इन रिश्तों की मिठास और प्यार का अहसास ही नहीं हो पाता है, क्योंकि कभी उन्होंने इन रिश्तों की गर्माहट को महसूस ही नहीं किया है। आज स्कूल के बस्ते के बोझ में दबा बचपन रिश्तों की पहचान भूल गया है। आज के बच्चों को अपने मोहल्ले में रह रहे बच्चों के बारे में ही पता नहीं होता तो उनको भाई-बहन मानकर प्रेम करने की बात तो कोसों दूर रह जाती है।

आज का व्यक्ति सिर्फ अपनी जिंदगी जी रहा है, उसे दूसरे की जिंदगी में झांकना दखलअंदाजी लगता है। वह सारी दुनिया की खबर इंटरनेट से रख रहा है, पर पड़ोसी के क्या हाल हैं उसे नहीं पता। परिवारों की टूटन ने रिश्तों की डोरी को कमजोर कर दिया है। आज का व्यक्ति आत्मनिर्भर होते ही अपना एक अलग घर बनाने की सोचता है। पहले हमारे बुजुर्ग जब भगवान से प्रार्थना करते थे तो कहते थे कि-  ईश्वर, “घर छोटा दे और परिवार बड़ा दे”। ऐसा इसलिए कहते थे कि घर छोटा होगा और परिवार बड़ा तो परिवार के लोगों में प्रेम बढ़ेगा। साथ रहेंगे तो अपनापन होगा, एक-दूसरे की वस्तु का आदान-प्रदान करना सीखेंगे और इससे एकता बढ़ेगी। लेकिन बदलते समय में व्यक्ति भगवान से एक अदद घर की प्रार्थना करता है कि-  ईश्वर, मेरा खुद का एक घर हो। तो ऐसे एक अलग घर में रिश्तों की सीख नहीं बन पाती और ऐसा घर बनते ही परिवार टूट जाता है।

सामूहिक परिवार में कब बच्चे बड़े हो जाते थे और दुनियादारी की समझ कर लेते थे, बच्चों के मां-बाप को पता ही नहीं लगता था। पर आज बच्चों को पालना एक बड़ा काम हो गया है। सामूहिक परिवारों में बच्चे अपने चाची, ताई, भाभी के पास रहते थे और उन लोगों को भी अपने इन बच्चों से काफी प्यार होता था। सामूहिक परिवारों में एक परंपरा बहुत शानदार थी। वह यह कि बच्चा अपने पिता से बड़े किसी भी व्यक्ति के सामने अपने पिता से बात नहीं करता था और पिता भी अपने से बड़े के सामने अपने बेटे-बेटी का नाम लेकर नहीं बुलाता था और अक्सर ऐसा होता था कि बच्चा अपनी ताई, चाची या भाभी के पास ही रहता था। बच्चे से उनका भी बराबर का लगाव होता था और यही लगाव पूरे परिवार को एकसूत्र में बांधकर रखता था।

हो सकता है कि भाई-भाई में लड़ाई हो जाए, पर भाई के बच्चे से लगाव के कारण परिवारों में टूट नहीं आती थी। शायद इसी अपनत्व का कारण रहा है कि आज भी उत्तर भारत में बेटी की शादी में बेटी के मां-बाप की अपेक्षा उसके चाचा-चाची या ताया-ताई से कन्यादान करवाया जाता है ताकि वे उसे अपनी बेटी ही मानें। ऐसा देखा गया है कि ऐसे चाचा या ताया कन्यादान के बाद उसको अपनी ही बेटी मानकर प्यार करते थे और जीवनभर उसके साथ वह ही रिश्ता निभाते थे और समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से देखें तो यह एक महान परंपरा रही है जिसने परिवारों को एकसाथ रहने के लिए प्रेरित किया है।